बड़ी मुद्दत हुई, तुम्हारी मीठी वाणी सुने हुए
ऋतू आयी, मौसम बदले, दिन महीने साल गुज़रे
पंछी आकाश का सफर घर आ गए
हवाएं दक्षिण से हो आयी, रिमझिम सावन बरसे
प्यासी धरती भी अब तृप्त हो गयी
फूल भी खिलने लगे, भवरे मंडराते हैं
कब तक ये मेरे होठ यूँ ही तरसे?
रूठ कर क्या गयी तुम, मेरी सांसे बस
अब तोह लौट आओ तुम प्रियतमा
बहुत हो गया मिटटी में थक कर सोना
ये तेरा यूँ ही बेपरवाह दुनिया से होना
बेवफा कहते कहते मुझे, तुमने क्यों परवाह छोड़ दी?
मुझ से मुँह मोड़ कर खुशियां मेरी ले ली
चलो छोड़ दो ये रूठने का सिलसिला
चलो आओ तुम अब लौट ही आओ
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