मन को लगता.. Man Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

मन को लगता.. Man

Rating: 5.0

मन को लगता
शनिवार,27 जून २०२०

मन को लगता था की यह होगा ही नहीं
अब जो हो गया उसपर यकिन भी होता नहीं
पाकर तुजी को ओ हमनशीन
अब जो हुआ है नहीं होता यकीन।मन को लगता

ना होगा कोई हम जैसा ख़ुशनसीब
जिस का चमक गया हो सितारा और नसीब
मिल गयी है मंझिल मुझे आसमानी
हो गई मुराद पूरी जिस्मानी। मन को लगता

ना चाहा और ना मैंने माँगा
फिर भी क्यों थी दिल मे हताशा?
फिर दिल से उठी एक आशा किरण
याद दिला गई मीठा -सा स्मरण। मन को लगता

पाकर तुझे में गदगद हो गई
मुस्कानमंदमंद चेहरे पे आ गई
तुम्हारी याद में में ऐसे खो गई
जागते हुए भी सपने में सो गई। मन को लगता

अब जो हुआ है बना ही रहे
मेरे मन कागुलिस्ता खिला ही रहे
हर फूल है मेरे मन की आशा
खश्बु का आलम खुशरखे बेतहाशा। मन को लगता

हसमुख मेहता
सयोजक: सानीआज़ाकिर

मन को लगता.. Man
Saturday, June 27, 2020
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
Varsha M 27 June 2020

Maan ko laga ki aaftaab hai Dil ko talab hui thande rahat ke Jhoom utha ye maan mera Watanukool yantra ke tale baith kar... Awesome beautifully woven poetry reflecting emotions. Beautiful sir.

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पाकर तुझे में गदगद हो गई मुस्कानमंदमंद चेहरे पे आ गई तुम्हारी याद में में ऐसे खो गई जागते हुए भी सपने में सो गई। मन को लगता अब जो हुआ है बना ही रहे मेरे मन कागुलिस्ता खिला ही रहे हर फूल है मेरे मन की आशा खश्बु का आलम खुशरखे बेतहाशा। मन को लगता हसमुख मेहता सयोजक: सानीआज़ाकिर Hasmukh Amathalal

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Mehta Hasmukh Amathaal

Mehta Hasmukh Amathaal

Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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