मेरा सफर... Mera Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

मेरा सफर... Mera

Rating: 5.0

मेरा सफर
गुरूवार, १४ मई २०२०

मेरे पाँव जमीन के ऊपर
जाना चाहता लम्बी सफर
हमेशा हो जाता असफल
पर कुछ ना कुछ तो मिलता फल।

अंधेरों से बाहर निकलना चाहता
ना दुरी किसी से बनाये रखता
ये मेरा सफर है
मेरे साथ बाकी हमसफ़र है।

में किसी का मोहताज नहीं
फिर भी किसी का ताज नहीं
मेरी अपनी दुनिया है संगीन
जहां दिन में रहता उजाला और राते हसीन।

सुनामि, कोरोना आक्रमण करे
मुझे संक्रमण करके प्रताड़ित रखे
होंसले दुर्बल नहीं, मे नासिपास हो जाऊं
वक्त आने पर में फिर से खड़ा हो जाऊं।

में बनाकर रखूंगा फासला और दुरी
नजदीकी होगी दिल से पर है मज़बूरी
उसने मेरी ओर पाँव बढ़ाए है
मेरी गर्दन पर दाँत गड़ाए है।

ना करो हमें नासीपास
हम टिके रहेंगे आसपास
बस दिल में रखी है एक ही आस
पूनम की रात आने दो, खत्म करके अमास।

ये धरती मेरी और मक़ाम भी मेरा
जल्द होगा मेरे वतन पर सवेरा
आंधी थम जाएगी बादल बरस जाएंगे
हमारे लिए एक सन्देश नया छोड़ जाएंगे।

हसमुख मेहता

मेरा सफर... Mera
Thursday, May 14, 2020
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM

wah, wah.. ayub khwar

0 0 Reply

shaji mathew 1 Edit or delete this Like · Reply ·

0 0 Reply

ये धरती मेरी और मक़ाम भी मेरा जल्द होगा मेरे वतन पर सवेरा आंधी थम जाएगी बादल बरस जाएंगे हमारे लिए एक सन्देश नया छोड़ जाएंगे। हसमुख मेहता

0 0 Reply
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Mehta Hasmukh Amathaal

Mehta Hasmukh Amathaal

Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
Close
Error Success