मेरीसोच.. Meri Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

मेरीसोच.. Meri

Rating: 5.0

मेरीसोच
गुरुकवार, ३० अप्रैल २०२०

मेरी सोच को कोई बंधन नहीं
में निर्धन हूँ पर धन की कोई कमी नहीं
में निराधार हू पर आधार पर निर्भित नहीं
नही कोइ सरहद पर जान सिमित नहीं।

में क्यों सौचु कोई दुखी रहे
मेरे चाहने से कोई सुखी होवे
जिनके भाग में लिखा है
उसका लेखा-जोगा होता रहे।

मेरी कायरता की कोई सीमा नहीं
पर उदारता की कोई मर्यादा नहीं
जो है मेरे पास वो बँटता रहे
किसी की आशा का तारा ना टूटता रहे।

ना था वो कभी मेरा
ना देता रहेगा साथ हमारा
आज जो मेरे पास है
"ना रहे सदा " उसकी भी कोई आस है।

जगत में सब धनि हो जावे
तो दुःख कदी नजदीक ना आवे
पर मन से कोई भीख माँगता रहे
वो जिंदगी में तरसता रहे।

ना सुखका कोई जतन
ना दुःख का कोई बँधन
ना मिले दोनों तो कोई गम नहीं
मिल जाए दोनों तो समागम यही।

हसमुख मेहता

मेरीसोच.. Meri
Thursday, April 30, 2020
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
Mehta Hasmukh Amathalal 30 April 2020

ना सुख का कोई जतन ना दुःख का कोई बँधन ना मिले दोनों तो कोई गम नहीं मिल जाए दोनों तो समागम यही। हसमुख मेहता

0 0 Reply
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Mehta Hasmukh Amathaal

Mehta Hasmukh Amathaal

Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
Close
Error Success