मीठा और शुद्ध जल.. Mitha Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

मीठा और शुद्ध जल.. Mitha

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मीठा और शुद्ध जल
गुरूवार, २७ अगस्त २०२०

कुँए की गहराई
कभी ना नाप पाई
जल कितना मीठा और शुद्ध
पिते, नर, नारीओर वृद्ध

वैसे तो विशाल होता तालाब
नहीं आता कभी उसमे सैलाब
तालाब का होता अपना रूतबा ओर रुआब
लुफ्त लेते लोग मिलाके पानीके साथ शराब।

पानी देता कुछ और ही आनंद
पिने के बाद मुस्कानमंदमंद
तृप्तहो जाता मन और देता आशीर्वाद
हम कभी ना करते पानी बर्बाद।

पानी के बिना दुनिया लगती पराई
पानी है तो समृद्धि आई
पानी के बिना श्रुष्टि नहीं टिक पाई
हमेंखुद लगता जीवन बेकार जाई।

हवा, पानी और आग
प्रकृति के मिल भाग
हमारा शरीर भी उनका एक अंग
बनता शरीर इनसे और हो भी जाता भंग।

जीवन में मीठास को लाना सहज नहीं है
आप रूखे रहना चाहोतो कोई परहेज नहीं है
रह जाओ बनके बरगद का पेड़
और दो लोगों को परछाई की भेंट।

अन्तर्मनजी शान्ति
और कुँए का मीठा पानी
ला देते जीवन मे बानी
वरना तो लगती हमें धुलधानी।

डॉ जाड़िआहसमुख

मीठा और शुद्ध जल.. Mitha
Thursday, August 27, 2020
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
Mehta Hasmukh Amathalal 27 August 2020

Poem: 59058574 - मीठा और शुद्ध जल.. Mitha Member: Sharad Bhatia Comment: गुरुजी सादर प्रणाम, गुरुजी, कुँए के पानी पीने का अपना ही एक अलग आनंद होता काश यह शहर मे हर society मे होता आभार आपका की आपने हम सब कुँए की पुरानी यादे ताजा करा दी

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Sharad Bhatia 27 August 2020

गुरुजी सादर प्रणाम, गुरुजी, कुँए के पानी पीने का अपना ही एक अलग आनंद होता काश यह शहर मे हर society मे होता आभार आपका की आपने हम सब कुँए की पुरानी यादे ताजा करा दी

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Mehta Hasmukh Amathalal 27 August 2020

ला देते जीवन मे बानी वरना तो लगती हमें धुलधानी। डॉ जाड़िआ हसमुख

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Mehta Hasmukh Amathaal

Mehta Hasmukh Amathaal

Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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