नैया... Naiyaa Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

नैया... Naiyaa

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नैया
मंगलवार, २ अक्टूबर २०१८

नैया है मझधार
बारिश भी हो रही धुआंधार
ऊँची उठती सागर की लेहरे
नाव मेरी दरिया में डोले।

जान को लगा है ख़तरा
किनारे पर पहुंचना है ज़रा
अभी तो नहीं लगते कोई आसार
नैया इधर उधर हो जाए बारबार।

मन भीतर से गभरा रहा
तन भी भय से कांप रहा
में बारबार ईश को याद करता रहा
नैया को काबू में रखने का प्रयास कर रहा।

अब तो छोड़ भी दी है आस
प्रभु आप तो हो कहीं आसपास
मुझे ना करना नासीपास
थोड़ी तो बंधाना दिल को ढाढस।

लगता है सुन ली प्रभु ने विनती
अब होने लगी उलटी गिनती
अब लहरें शांत होने जा रही
दिल में आशा की किरण दिखाई रही।

हसमुख अमथालाल मेहता

नैया... Naiyaa
Tuesday, October 2, 2018
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
Mehta Hasmukh Amathalal 03 October 2018

welcome s r chandrslekha 1 Manage Like · Reply · 1m

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Mehta Hasmukh Amathalal 02 October 2018

welcome Khalid AL-hamami 1 1 Manage Like · Reply · 1m

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Mehta Hasmukh Amathalal 02 October 2018

लगता है सुन ली प्रभु ने विनती अब होने लगी उलटी गिनती अब लहरें शांत होने जा रही दिल में आशा की किरण दिखाई रही। हसमुख अमथालाल मेहता

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Mehta Hasmukh Amathaal

Mehta Hasmukh Amathaal

Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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