मेरा प्रण.. Pran Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

मेरा प्रण.. Pran

Rating: 5.0

मेरा प्रण
शुक्रवार, ३१ जुलाई २०२०

में कैद नहीं होना चाहती हूँ
बस आझाद रहना चाहती हूँ
ना रोको तुम सब मेरी उड़ान को
सुख-चैन से रहने दो मेरे पड़ाव को।

मेरी मंझिल कही दूर है
मुझे जाना भी बहुत दूर है
समंदर है बीच मे मेरी रुकावट
पर मुझे नहीं लग रही कोई भी थकावट।

मेरी पहुंचना तय है
मेरे गाने में लय है
मंसूबा बना लिया है मैंने
सफर काना है मुझे अकेले।

ये जंजीरे मुझे रोक नहीं पाएगी
मेरे मंसूबो को लगाम नहीं लगा पाएगी
आप कोशिश ना करे मुझे बंदी बनाने!
मई तो उड़ चली सपने संजोने।

यही मेरा प्रण है
और समर्पण भी
यदि में कामयाब हो गयी
समज लो मेरी मनसा पूरी हो गयी।

Dr. Jadia hasmukh

मेरा प्रण.. Pran
Thursday, July 30, 2020
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM

यही मेरा प्रण है और समर्पण भी यदि में कामयाब हो गयी समज लो मेरी मनसा पूरी हो गयी। Dr. Jadia hasmukh

0 0 Reply
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Mehta Hasmukh Amathaal

Mehta Hasmukh Amathaal

Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
Close
Error Success