एक शांत, सुनसान रात,
रात का दूसरा पहर,
लगभग दो बजे।
एक हल्की आहट,
एक अनजाना अहसास,
एक गहरा भ्रम,
कि कोई घूम रहा है छत पर।
लौटा था मैं उसी शाम,
श्मशान से होकर,
परिवार के एक प्यारे सदस्य का
अंतिम-संस्कार करके।
उस अंधेरी रात में,
खुले आसमान के नीचे,
मैं अकेला सोया था छत पर।
पर बार-बार,
मन के भीतर
एक बात कौंधती थी,
कोई अनदेखा साया,
लगातार घूम रहा है छत पर।
कभी लगता,
कोई पास आकर
बैठ गया है,
पूछ रहा है बड़े प्यार से
मेरा हाल-चाल।
लेकिन जैसे ही मैं खोलता
अपनी घबराई हुई आँखें,
वहाँ सन्नाटे के सिवा
कुछ न मिलता,
मानो वह बस एक सपना था।
कभी लगता,
कोई सीढ़ियों से ऊपर
आ रहा है छत की तरफ,
पायलों की धीमी,
छन-छन करती
आवाज़ के साथ।
मैं बेचैन होकर
बिस्तर पर उठ बैठा,
तभी मन में उमड़ने लगा
सवालों और शंकाओं का तूफ़ान।
कौन था वह?
जिसके कदमों की आवाज़
मैंने अभी-अभी सुनी?
बार-बार सोचा,
बार-बार उस सच को
जानने की कोशिश की,
किंतु सामने केवल
गहरा अंधेरा था,
और एक सुनसान आहट।
अचानक फिर
एक साफ़ आवाज़ गूँज उठी,
वही छन-छन का स्वर।
जैसे कोई सीढ़ियों पर
लगातार कदम बढ़ा रहा हो,
कभी वह रहस्यमयी
परछाई बनकर दिखता,
तो कभी सिर्फ एक आहट में।
और कभी ऐसा लगता,
वह मेरी छत पार करके
जा रहा हो पास की छत पर।
पल भर में मौसम भी
अजीब रूप बदलने लगती,
कभी तेज़ आंधी चलती,
कभी सनसनाती हुई रात का
शोर होता।
कभी हवा का झोंका
बहुत तेज़ हो जाता,
तो कभी बिल्कुल धीमी
हवा बहने लगती,
कभी आसमान में बादल
ज़ोर से कड़कते,
तो कभी सारी हवा
बिल्कुल शांत होकर
कहीं छुप जाती।
मैं बिल्कुल अकेला था,
दिल में एक छुपा हुआ
डर लिए,
लेकिन पूरी हिम्मत बटोरकर
करता इन सब अजीब
बातों का विचार।
सोचते-सोचते
कभी नींद आँखों पर
भारी हो जाती,
किन्तु कभी किसी अनजान,
कोमल स्पर्श की छुअन
मुझे फिर से जगा देती।
पर उस छुअन में
एक जानी-पहचानी ममता थी,
जो धीमे से सहलाकर
मेरे सारे डर हर लेती।
मैं भीतर तक कांप उठता,
पर अपने भीतर
वैसी ही हिम्मत का
संचार करता,
जैसे किसी खाली पहिए में
भरी जाती है हवा।
व्याकुल होकर
जब मैं नीचे झाँककर देखता,
तो देखता कि आँगन और
मुख्य दरवाज़े पर
सभी बेचैन लेकिन सोए हुए हैं।
तभी एक तेज़
घबराहट के साथ,
कोई साया तेज़ी से दौड़कर
मेरे पास आता।
और यह पक्का भरोसा जगता,
कि मेरे पीछे
मेरे अपने ही खड़े हैं,
वही ममतामयी परछाई,
वही पुराना आशीर्वाद।
लेकिन जब मैं मुड़कर देखता
अपनी थकी हुई नज़रों से,
तो वहाँ कोई नहीं होता।
इसी बीच,
न जाने कब नींद ने घेर लिया।
और अब,
सुबह हो गई।
जगा जब मैं,
तो सामने एक सुनसान दिन देखा।
एक ऐसा दिन,
जिसमें सभी उदास थे
और बेचैन।
एक गहरा अहसास लिए,
एक मूक आहट लिए सभी।
हताश, उदास से,
कोई चौखट पर,
तो कोई दरवाज़े पर बैठा था।
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