बड़ी होती सृष्टि Poem by Rajnish Rajan

बड़ी होती सृष्टि

वो गाँव की नन्ही सी,
खेलती सृष्टि अब बड़ी हो गई है,
अनजाने में वो सब से हँसती-बोलती,
सबको हँसाती है।

अब वो नन्हें कदमों के जूते,
पैरों में नहीं आते थे,
देखते ही देखते,
कॉलेज और पढ़ाई के दिन करीब आ गए थे।

उसे क्या पता था कि समाज,
इस सादगी को कुछ और कहता है,
मासूमियत को उसकी,
यह ज़माना एक गुनाह समझता है।

समाज के कथित 'बड़े' लोग,
अब पिता को नया ज्ञान दे रहे हैं,
औरतों की महफ़िल में,
उसके ही चर्चे सरेआम हो रहे हैं।

कोई उँगली उसके कपड़ों पर,
कोई चाल के ढंग पर उठाता है,
ये ज़माना हर पल,
उसके इस बिंदास अंदाज़ से घबराता है।

अब उसके लहराते बालों की चर्चा,
भी गली-कूचों में तेज़ है,
उसके रूप, उसके रंग, उसकी सुंदरता से
सबको परहेज़ है।

जैसे मानो सुंदर होना ही,
उसने सबसे बड़ा गुनाह कर दिया है,
ख़ुदा ने बख़्शी थी जो नेमत,
उसे ज़माने ने एक दाग़ बना दिया है।

अब हर चौखट पर ज़िक्र है,
कि 'उसकी बेटी का चलन ठीक नहीं',
दूसरों के किरदार तौलते हैं वो,
जिनका खुद का दामन साफ़ नहीं।

ताने वो भी कस रहे हैं उस पर,
अपनी आँखों का पानी मारकर,
जिनकी अपनी बेटी चार बार भागकर
हो आई है, सब कुछ खोकर।

ये वही कथित शरीफ़ लोग हैं,
जो बाहर ओढ़े बैठे हैं शराफ़त के चोले,
अगर मिल जाए मौका इन्हें ज़रा सा,
तो ये सबसे पहले नीयत खो लें।

पर अब चौखट के भीतर,
अपनों ने उसे पास बिठाकर समझाया है,
'तुम गलत नहीं हो बेटी', पिता ने
सर पर हाथ रखकर यह हौसला जगाया है।

कहा कि 'ज़माना तो कुछ भी कहेगा,
तुम इन बंदिशों को तोड़कर आगे बढ़ो,
हम हर कदम पर साथ हैं तुम्हारे,
तुम दुनिया से बेखौफ होकर लड़ो।

हाँ, थोड़ा इशारा देकर माँ ने
यह भी धीमे से जताया है,
कि तुम अब आँखों में,
समाज की खटकने लगी हो,
पिंजरों के शौकीनों को,
तुम्हारी आज़ादी अब चुभने लगी है।'

अब भाई भी बाहर के लोगों की
मैली नज़रों का पहरेदार हो गया है,
उम्र में छोटा है वो महज़ पाँच साल का,
पर समझ में सबसे बड़ा हो गया है।

बाप से भी गहरा वो अपनी
इस दोस्त जैसी दीदी का दर्द समझता है,
अपनी तोतली मासूम ज़ुबान से,
वो हर रोज़ उसे ज़माने की हक़ीक़त समझाता है।

कहता है, 'दीदी, जब तुम बाहर
पढ़ने के लिए कदम बढ़ाती हो,
ये लोग अच्छी नीयत से नहीं देखते तुम्हें,
जब तुम हँसती-मुस्कुराती हो।'

पाँच बरस का वो नन्हा कंधा,
अब दीदी की सबसे अभेद्य ढाल बन गया है,
जो समाज उसे उजाड़ना चाहता था,
उसके आगे वो एक अटूट दीवार बन गया है।

सृष्टि भी अपने माँ-बाप से
हर एक छोटी से छोटी बात साझा करती है,
दिल में कोई चोर नहीं उसके,
वो अपनी हर एक सच्चाई पल में बयां करती है।

वो बताती है कॉलेज के दोस्तों के किस्से
और अपनी पढ़ाई की बातें,
राह में चलते-घूमते उन लफंगों की करतूतें
और उनकी गंदी आँखें।

छोटा भाई जब दुलार से समझाता है,
तो वो मुस्कुराकर उसे गले से लगाती है,
अपने उस पाँच साल के रक्षक पर,
वो जी भरकर अपना सारा प्यार लुटाती है।

पर इन सब से अनजान बनकर,
सृष्टि अपनी ही धुन में खोई रहती है,
ज़माने की बंदिशें एक तरफ,
वो आज भी बेपरवाह होकर अपनी ज़िंदगी जीती है।

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