नभ के कठिन प्रांगण खड़ा, मार्तण्ड का अभिमान है;
ज्वाला बिखरती रश्मियाँ, झुलसा रहा भू-भाग है।
आतप विकल वसुधा हुई, झुलसा रहा जग-प्राण है;
पश्चिम क्षितिज के छोर पर, यह तेज भी ढल जाएगा।
पर मौन नभ के कोने में जाकर, तिमिर में खो जाएगा;
हँसकर बिछाने चाँदनी, फिर शशधर यहाँ आएगा।
हे अनिल! ला तनिक शीतलता, निज अमित गरिमा जगा;
चल मंद गति मस्तानी बन, ये प्रखर लपटें मत बहा।
दे शांति शीतल, तृप्त कर, बन ताप-हारी संसार का;
बन तूर्य झंझावात का, अब मेघ-अंबर तान तू।
कर शांत शीतल चित्त को, ले वेग नव अब बह पवन;
झुलसे हुए इस विश्व को, दे नव-जीवन का सृजन।
हे देव गिरि के! सुन विनय, मार्तण्ड को अब शांत कर;
हो सके तो ढक ले उसे, अंबर जलद से पूरित कर।
हाहाकार जग में मच रहा, यह आर्तनाद तू भी सुन;
मीन व्याकुल तप्त तोय में, जल को तनिक शीतल तो कर।
सुन आर्तनाद इस सृष्टि का, अब देव! करुणा धार दो;
घनघोर जलद की ओट में, मार्तण्ड को विश्राम दो।
व्याकुल सभी खग-वृन्द हैं, जीवन तड़प कर रो रहा;
बरसो, बनो जीवन-प्रदाता, ताप सब संहार दो।
कहो इससे, हे देव गिरि! यह रौद्र रूप अविकल न रहे;
हम सतत अर्चक हैं इसके, पर तरुवर अब भू पर न रहे।
संवरण करे यह चण्ड विभव, मंदित कौतुक बिखराए अब;
मूर्छित वसुधा, व्याकुल चराचर, जीव-मनुज बेसुध पड़े।
हे सूर्य देव! तुम शरद काल में, अपना चण्ड रूप दिखलाना;
अनुकूल समय हो जब जग का, तब विमल प्रकाश फैलाना।
संकट-विकल है सृष्टि सारी, तनिक मंद मुस्काना तुम;
झुलस रही इस व्याकुल धरा पर, अमृत रस बरसाना तुम।
धिक्कार तुझे हे नीच मनुज! तू दानव से भी बदतर है,
चीर रहा जो माँ का आँचल, यह कैसा प्रतिघात है?
पोषण जिसने तेरा किया, तूने उसे ही लहुलुहान किया,
अपनी ही जीवनदायिनी को, विष का कैसा उपहार दिया?
तरुवर काटे, नदियाँ सोखीं, अंबर में बारूद भरा,
तेरे इस अंधे लालच से, आज सुलगती विकल धरा।
तू समझ रहा खुद को ज्ञाता? तू परम मूर्ख, तू अंधा है,
विनाश की इस महा-वेदी पर, खुद तेरा ही शव बँधा है।
बाहर की वायु प्रदूषित की, भीतर का मानस सड़ा लिया,
मर्यादा की अर्थी फूंक, तूने दानव चोला चढ़ा लिया।
हे मानव! संभल अभी, वरना यह कोप न थम पाएगा,
तांडव होगा जब प्रकृति का, तेरा नाम-निशान मिट जाएगा!
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