ये प्रेम रस है, प्रेम है अपना। Poem by Rajnish Rajan

ये प्रेम रस है, प्रेम है अपना।

तन मन मेरा सुलग रहा है,
अब टोक ना मुझको ऐ साकी!
मधुरस है पीने दे मुझको,
अब रोक न मुझको ऐ साकी!

मृदु हाला है, पीने दे मुझको,
इश्क़ नशा है, जीने दे मुझको।
मधुमय कर दे मय भर अपना,
ये प्रेम रस है, प्रेम है अपना।

मृदु हाला है, प्यार छलकता,
'तू भी नशे में, ' रुक जा कहती।
कर कमल तेरे मधुमय हैं,
प्याला भर तू, हाला छलकाती!

रोक सकूँ ना मैं अपने को,
रोक सके ना तू अपने को।
ऐ साकी, तू पिलाने वाली,
मैं प्रेम रस को पीने वाला!
मधुरस है पीने दे मुझको,
अब रोक न मुझको ऐ साकी!

ये उम्र नशीली, तू है नशीली,
बातों में मेरी, बातों में तेरी।
प्यास भरी है, हाला छलकाती,
उम्र भी मेरी, उम्र भी तेरी,
अब रोक न मुझको ऐ साकी!

कांच के प्याले टूट भी जाएँ,
होश मुझे न दिलाना साकी!
उम्र जो तरसा, प्यासा हूँ मैं,
पीने दे जी भरके मुझको,
बस याद दिलाना, तू मेरी साकी!

तन मन मेरा सुलग रहा है,
अगन की हाला और भरो तुम!
कांच के प्याले टूट भी जाएं,
पर मदहोश मुझे कर जाना तुम!

प्रेम रस की धारा में मैं,
ये प्रेम रस है पीने दे मुझको,
मैं बरसों का ठहरा हूँ प्यासा।
वो बरसों का चटका है प्याला,
हाँ, टूट रहा जो टूटने दे साकी!
अब टोक न मुझको तू साकी!

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