समाज: किस ओर? Poem by Rajnish Rajan

समाज: किस ओर?

एक अनुशासन का पहरा था,
जो बंधन सा लगता था;
वह बंधन नहीं,
समाज को पतन से बचाए रखता था।

ताकि भटके न कोई राह यहाँ,
सुगम रहे हर एक डगर यहाँ;
पर वक्त के क्रूर थपेड़ों से,
अब ढांचा ही बदल गया।

अस्तित्व आज खतरे में है,
परिभाषा भी बिखर गई;
मर्यादा की वह पावन गंगा,
स्वार्थ की भेंट चढ़ गई।

अब रसूखदार इस महफ़िल में,
बस अपना लाभ टटोल रहे;
कुरीतियों के इस दलदल में,
वह ज़हर नया ही घोल रहे।

आज़ादी का नाम थमाकर,
मर्यादा तोड़ी जाती है;
जिस शिक्षा से संस्कार बढ़े,
वह पीछे छोड़ी जाती है।

गर्त में गिरता जा रहा समाज,
यह कैसी अंधी चाल है?
कानून यहाँ असहाय खड़ा,
व्यवस्था पूरी बेहाल है।

महंगाई की इस मार तले,
हर आम आदमी रोता है;
दौलत के मद में चूर अमीर,
तिनके से भी तुच्छ होता है।

सरकार की नीतियां फेल हुईं,
सिस्टम बस मौन खड़ा रहा;
नेताओं की इस अंधी लूट में,
हर एक नागरिक छला रहा।

हम धर्म के झूठे नारों पर,
कीड़ों की भांति लड़ते हैं;
इंसानियत को खुद भूलकर,
अपनों के हाथों मरते हैं।

अस्पताल की चौखट पर,
दम तोड़ रही लाचारी है;
और स्कूलों के कमरों में,
बस कागज़ की बीमारी है।

सरकारी दफ्तर बन बैठे हैं,
अब वो लूट के खुले अड्डे हैं;
हर गली-कूचे में खोदे हैं,
मदहोशी और नशे के गड्ढे हैं।

चोरी और चकारी ने भी,
अब डिजिटल चोला ओढ़ लिया;
सच्ची बातें चुभतीं सबको,
सबने सच से मुंह मोड़ लिया।

रंग - रूप के इस बाज़ार में,
साँवली का जीना मुहाल है;
अनपढ़ बैठे ऊंचे आसन,
पढ़े-लिखों का बुरा हाल है।

भ्रष्टाचार चरम पर पहुंचा,
चारों तरफ प्रदूषण का डेरा है;
आतंक दौड़ता सरेआम,
और गहराता यह अंधेरा है।

बिना साधना,
बिना मेहनत,
सबको तुरंत ही मोक्ष चाहिए;
शॉर्टकट के पीछे भागते,
बस फल का ही संतोष चाहिए।

संस्कार की पूंजी खोकर,
झूठी चमक अपना रहे हैं;
मोबाइल के इस पर्दे पर,
अपनी इज़्ज़त बेच रहे हैं।

शर्म-हया की सीमा टूटी,
कैसा यह आधुनिक दौर है?
व्याकुल होकर मन पूछता,
समाज जा रहा किस ओर है?

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