मौन तड़प को कौन देखे?
मैं जो तड़पूँ पी के प्याला।
यह हाला नहीं,
है विष का प्याला।
मौन सिहरन में जीने वाला,
हाला से भी गहरा है प्याला,
विष-घूँट मैं पीने वाला।
मैं विरह की शाम-वेदना,
बह रहा वह जाम अपना।
पी रहा मैं विष का प्याला,
दंश-घूँट मैं पीने वाला,
हाँ, दंश रहा कोई है अपना।
यह विष का प्याला जाम नहीं है,
अपनों से धोखा, ज़ख़्म है गहरा।
दुनिया बात-बात पर विष उगलती,
ज़ख़्मों पर नमक छिड़कती है।
सब प्याला भर के जाते हैं,
हाँ, विष उगल के जाते हैं।
बात विगत क्या बात हुई अब?
मैं जो तड़पूँ रात हुई तब।
कौन है अपना, कौन पराया?
मैं घुटता राही, पीता प्याला,
मौन तड़प को जीने वाला,
हाँ, विरह-बाण मैं सहने वाला।
कौन समाज और कौन है प्यारा?
जो भी आता, भर जाता है प्याला।
जाम, शाम सब पीकर चलता अब,
कौन पिए वह विष का प्याला?
हाँ, विष-घूँट मैं पीने वाला,
विरह-शाम मैं जीने वाला।
दर्द कसकता बात-बात पर,
उम्र न ढलती रात-रात भर।
हाँ, सच्चा साथी मौन है अपना,
इस दुनियादारी में कौन है अपना?
बात दरकती होठों से जब,
अपने ही दुश्मन बन जाते हैं।
हाँ, मौन कसक में जीता हूँ,
कालकूट मैं पीता हूँ।
ऐ साक़ी! तू पिलाने वाली,
अब छोड़ जा मुझको, ऐ साक़ी!
यह हाला नहीं,
है विष का प्याला,
इसका एक भी छींटा,
फिर दुनिया भारी।
विष-घूँट को पी लूँगा मैं,
हाँ, विरह-शाम को जी लूँगा मैं।
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