सूरज को जब ढलते देखा, लाली उसकी फीकी थी,
घाट पे नदियों को देखा, बहती धारा भी रोई थी।
हम बैठे थे वो बैठी थी, शोर हवाएँ करती थीं,
बातें ही बातों में दोनों की, आँखें खूब रोई थीं।
सन-सन करती सर्द हवाएँ, बातों को वो काट रही थीं,
तीर सरीखी चुभती बातें, रो-रोकर समझा रही थीं।
आँखें उसकी बह रही थीं, जैसे नदियों की धारा,
मेरी आँखें सुबक रही थीं, आँखें ताकें जग सारा।
घाट पे दोनों घुट रहे थे, घाट भी पूरा सहमा था,
चाल थी तिरछी, हाथ हाथ से, छूटने की अब बारी थी।
हाथ दबाकर उसने छोड़ा, कदम यूँ उसके धीमे थे,
मुड़कर हमने वापस देखा, आँखों में बहती धारा थी।
पल में मिलना और बिछड़ना, किस्मत की वो मारी थी,
हम दलदल में वो दलदल में, शाम तो सब पर भारी थी।
बनना-बिछड़ना, दिल का तड़पना, बातें उस दिन समझी थीं,
चाह के दोनों, चाह न सके हम, वो चाहत की मजबूरी थी।
चाँद की किरणें पड़ने लगी थीं, चंदा में भरी उदासी थी,
कदम तो उनके दूर गए पर, यादें दिल में ठहरी थीं।
वो तो चली गई पर उसकी, परछाईं मेरे साथ खड़ी थी,
बातें अधूरी, रात अधूरी, विरह की बेला लंबी थी।
कर्म लेख में मिलना बिछड़ना, बातें सब ये सच्ची थीं,
घाट था सूना, रात थी गहरी, बस सन्नाटे की बारी थी।
कहने को तो सब छूटा था, पर विरह की रात भारी थी।
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