बहकती आरज़ू है मेरी,
और अंधेरी घनेरी रात।
तेरे बदन की ख़ुशबू में डूबा,
कहो, कैसे करूँ मैं प्यार?
बिखरी-बिखरी ज़ुल्फ़ें सनम,
तेरे गोरे-गोरे गाल।
मस्त चमकती आँखें तेरी,
कहो, कैसे करूँ मैं प्यार?
तेरे नैन-नक्श की बातें प्रिये,
तेरे होठों की लाली मुस्काय।
मस्त चाँद से रोशन चेहरे पर,
कहो, कैसे करूँ मैं प्यार?
तेरे गले का सुंदर अक्स प्रिये,
यूँ मीठी सी बोली खिल जाय।
तेरी सुंदर मस्त सुराही गर्दन,
पत्थर में मोती खिल जाय।
तेरे धड़कन की सुंदर थाप प्रिये,
खिलते यौवन का श्रृंगार बढ़ाय।
तेरे आँचल की शीतल छाँव प्रिये,
मेरा दिल धड़के और मन हर्षाय।
तेरी बाहों की सुंदर नक्काशी प्रिये,
मैं मखमली तुम्हारा यूँ अंदाज़ जियूँ।
तेरी सूरत की मूरत पे मैं ऐसे ठहरा,
कहो, कैसे मैं तुमसे प्यार करूँ?
तेरे कमर की मृग-छौनी चाल प्रिये,
ओह! लचक से मेरा मन मचलाय।
कमर पे लिपटी वो सिल्की साड़ी,
तेरी, मेरे नैनों को छलनी कर जाय।
वो तेरे पैरों के सुंदर यूँ नक्श प्रिये,
हर अंगुली में खूब बिछिया हर्षाय।
घायल पायल की मूर्छित छनक भी,
पैरों को छूते एक संगीत बन जाय।
मेरी बहकती तुमसे आरज़ू प्रिये,
कहो, कैसे करूँ मैं तुमसे प्यार।।
© रजनीश राजन