तुम धो डालो अपने श्रृंगार को
जहां न जीवन का लय हो।
जहां नीरवता है हर साज में
वहां श्रृंगार का भला क्या मूल्य।।
तुम जीवन के पाषाण लोक में
आए थे सज धज कर।
काश यदि मिल पाता जीवन
फिर क्यूं वसुधा होती बंजर।।
तुम नयन शिखा में बैठे हो
गुण अवगुण को बिसारकर।
जड़ और चेतन का भेद नहीं
फिर क्यूं हो इतना भरमाए से।।
तुम पूर्णिमा की चांदनी बन
अमावस्या के तिमिर में विलीन हो जाना।।
Created on 21/9/2025
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@ Ramesh Rai
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