चाँद से बातें Poem by Savita Tyagi

चाँद से बातें

चाँद मेरी गली से गुजरना कभी
मेरी खिङकी पे झिलमिल चमकना कभी।

वो बचपन का आँगन नही भूलता
पेड़ की डाल से झूला था डोलता।

उसकी उचाँइयों पर थिरकती हुई
उड़ते आँचल से नज़रे फिसलती हुई,

काले गेसू की दो दो गुथी चोटियां
काँच की चमचमाती हुई चूड़ीयां।

चाँद अंबुअा की बगिया मे जाना कभी
यादें मासूम बचपन की लाना कभी।

चाँद मेरी गली से गुजरना कभी
मेरी खिङकी पे झिलमिल चमकना कभी।

चाँद तूने भुला दी क्या वो वादियां?
चाँदनी रात की सारी अठखेलियां।

वो रंगीन सपनो की गहराइयां
बहके बहके ख्यालों की रूबाइयाँ।

डूब कर उनमें मदहोश होना कभी
किस्से अल्हड़ जवानी के सुनना कभी।

चाँद मेरी गली से गुजरना कभी
मेरी खिङकी पे झिलमिल चमकना कभी।

चांद रूठे जो दुनिया तो शिकवा नहीं
रूठ कर दूर मुझसे, तू ना जाना कभी।

चांद मेरी अरज इतनी करना कबूल
तेरे बिन मुझको जीना न होगा मन्जूर।

चाँद मेरी गली से गुजरना सदा
मेरी खिङकी पे झिलमिल चमकना सदा।

१.५.१३

Thursday, November 14, 2019
Topic(s) of this poem: memories,moon
COMMENTS OF THE POEM
Kumarmani Mahakul 19 November 2019

A beautiful poem on conversation with moon is so hauntingly delineated. Each and every line is interesting to read. The memory of childhood is well portrayed here. Enjoyed. Thanks for sharing.

0 0 Reply
Savita Tyagi 20 November 2019

Thank you so much Kumarmani Ji for your sweet comment.

0 0
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success