ठोकरे खाते रहो... Thokre Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

ठोकरे खाते रहो... Thokre

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ठोकरे खाते रहो
गुरूवार, २६ दिसंबर २०१९

पेड़ की हर शाख पर उल्लू बैठा है
चुल्लू मे पानी लेकर बैठा है
कोई मिल जाए अपने जैसा
में उसको भी बना दू वैसा!

ढूंढने की जरुरत ही कहाँ है
जहाँ देखो वहां उपलब्ध है
हम देखकर और सुनकर क्षुब्ध है
बाकि सब तो ऐसे ही स्तब्ध है!

हम ने जूठ बोलने मे महारथ हांसिल की है
शराफत का सिर्फ चौला पहंरखा है
बाकी बेईमानी की तो कमी ही कहाँ थी
एक ढूंढो हजारो में पाई जाती थी

ईमानदारी हो गई रंगदारी
पालो सब कुछ जब कार्डो तरफदारी
कितने ही बिक गए ईमानदारी एक नाम पर
कुर्बान हो गए ईमान बेच कर

ना कह सके कोई "मैं ईमानदार हूँ "
बस कहने को ज्यादा समझदार हूँ
यदि ना बीकता ईमान यहां तो में क्या होता?
हर गली की में ऐसे ही ख़ाक छानता होता।

बस एक नसीहत देना है
आपने ईंमानदार नहीं बनना है
यदि बनना ही है तो तैयार रहो
ज़माने के सामने बस ठोकरे खाते रहो।

हसमुख मेहता

ठोकरे खाते रहो... Thokre
Thursday, December 26, 2019
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
Mehta Hasmukh Amathalal 26 December 2019

बस एक नसीहत देना है आपने ईंमानदार नहीं बनना है यदि बनना ही है तो तैयार रहो ज़माने के सामने बस ठोकरे खाते रहो। हसमुख मेहता Hasmukh Amathalal

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Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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