तुम ही तुम..... Tum Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

तुम ही तुम..... Tum

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तुम ही तुम
शुक्रवार, २६अक्टूबर २०१८

यहां तो मेला लगा हुआ है
कितने ही लोगों से मिलना होता है
सब अपने में मस्त है
अपने अपने काम में व्यस्त है।

सब से अच्छे भाव से मिलते है
जो करीब है उनसे बात भी कर लेते है
अपनी बातें शेयर कर लेते है
और मन का भर हल्का कर देते है।

पर वो बात नहीं जो तुम में है
कितना लगाव है
अस एक दिली चाह है
बाते करो तो राह आसान होगी।

बार यही बात उमड़कर सामने आ जाती है
बस मनको अशांत कर के चली जाती है
तुम हो की बात ही नहीं करना चाहती
बस दूर से अपनी बात कहकर चली जाती

याद तो हमें भी आती है
किसीकी ज्यादा नहीं पर तुम्हारी आती है
एक ही तो हो जो दूर ना होकर भी पास है
लगता है कही इधर ही आसपास हो।

कभी तो सुना दिया करो
अपने मन की बात और कहा करो
डांटा करो पर बोलो तो सही
हमें रहना और मरना दोनों यही।

हसमुख मेहता

तुम ही तुम..... Tum
Friday, October 26, 2018
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
Kumarmani Mahakul 26 October 2018

This poem is also a very brilliant poem beautifully penned. This has deep essence within...10

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Mehta Hasmukh Amathalal 26 October 2018

welcome tarun h mehta 1 Manage Like · Reply ·

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Mehta Hasmukh Amathalal 26 October 2018

कभी तो सुना दिया करो अपने मन की बात और कहा करो डांटा करो पर बोलो तो सही हमें रहना और मरना दोनों यही। हसमुख मेहता

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Mehta Hasmukh Amathaal

Mehta Hasmukh Amathaal

Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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