विशाल पावन धरा .. Vishal Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

विशाल पावन धरा .. Vishal

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विशाल पावन धरा
रविवार, १६ अगस्त २०२०

वो जज्बा कहाँ से लाऊँ
तेरे पे में जान न्योछावर कर जाऊं
मेरे वतन की मिटटी को शान से भर पाऊं
ये वतन तेरे लिए, हरबार कुर्बान हो जाऊं।

तूने दी पाँव रखने को धरती
मेरा सर हमेशा सलाम करती
ऊपर आसमान नीचे विशाल धरा
उसपर बहती कलरव करती धारा।

ना डाले कोई आँखे नापाक निगाह
हम को हो जाए उसका तुरंत आगाह
हम निकाल लेंगे वो दुश्मन की आँखे
फिर ना करे हिम्मत और मुड के देखे।

हम ना चाहे किसी की तसु जमीन
ओर ना करेंगेकिसी के कदम तस्लीम
करे यकिन हम पर, हम मिट जाएंगे
पर उसके लिए तो कफ़न भीना देंगे।

ना देश आज कल का है
ये तो आग का एक दरिया है
पेहचानो तो पैगाम, दोस्ती का है
मर मिटने का, वतन परस्ती का है।

आओ लेलेप्रण वचन रक्षा का
देशवासियों की ख़ुशी ओर सुरक्षा का
देश रहेगा और मिटटी की भीनी सुगंध
कोई कर ले कोशीष कितनी भी और प्रपंच

डॉ जाड़िआ हसमुख

विशाल पावन धरा .. Vishal
Sunday, August 16, 2020
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
Sharad Bhatia 16 August 2020

भारत मेरा जान से प्यारा है, ऐसा प्यारा वतन हमारा हैं।। जय हिंद

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Mehta Hasmukh Amathalal 16 August 2020

देश रहेगा और मिटटी की भीनी सुगंध कोई कर ले कोशीष कितनी भी और प्रपंच डॉ जाड़िआ हसमुख

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Mehta Hasmukh Amathaal

Mehta Hasmukh Amathaal

Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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