Zindagi/ ज़िन्दगी Poem by Varsha M

Zindagi/ ज़िन्दगी

Rating: 5.0

कुछ दिल केह जाता है,
कुछ सांसे पिरो देती है;
ना तन, ना मन, अब अपना है,
बाकी जो है वो सपना है।।

के कहे अब अपना दुखड़ा,
जो था वो आनू बन बेह गया;
कोरा कागज़, कर गया मुझे,
पल भर के झोंक में।।

ना सोचा था, जिंदगी अपनी,
ऐसी रूखी सूखी होजाएगी;
पर अब जाना है मैंने कि,
फिर से शुरू करने की कोई उम्र नहीं।।

गिर कर फिर से उठने को ही,
ज़िंदगी कहा करते हैं।।

Thursday, February 4, 2021
Topic(s) of this poem: hope,life
POET'S NOTES ABOUT THE POEM
Be a fighter in life, that is what it teaches always.
COMMENTS OF THE POEM
M Asim Nehal 05 February 2021

Wah wah kya baat hai.....पर अब जाना है मैंने कि, फिर से शुरू करने की कोई उम्र नहीं।।10****

0 0 Reply
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success