M. Asim Nehal

Gold Star - 165,800 Points (26th April / Nagpur)

खूब सजावट - Poem by M. Asim Nehal

इस दिल की मैंने क्या खूब सजावट की है..
एक कोने में है ग़म और एक कोने में दवा भी है...

अरे बीच का क्या बोलूं धोखे से सजा रखा है
बेवफाई का है सोफ़ा और कुर्सी बुराई की है

एक आँख नहीं भाता मुझको हसना किसी का
कांटे कटीले मैंने राहों में बिछा रखा है....

इस दिल का फरेब जाने किस किस को दिखाइए देगा
एक खून का दरिया है और चोट अदाओं की भी है...

झील मोहब्बत की रोकेगी राह उनकी जो प्यार से मिलते हैं
सैलाब खबर लेगा उनकी जो मिलकर रहने की सोचते हैं....

बाहर से मैंने इसे क्या खूब सजा दिया है
अच्छाई भलाई का आईना इसमें लगा दिया है....

Topic(s) of this poem: satire, satire of social classes

Form: Free Verse


Comments about खूब सजावट by M. Asim Nehal

  • Rajnish Manga (12/2/2015 1:46:00 AM)


    आज हमारे समाज में चारों ओर जो दिखावट और बनावट का बोलबाला है, उस पर आपने अच्छा कटाक्ष किया है. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति. धन्यवाद, मो. आसिम जी. (Report) Reply

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    0 person did not like.
  • Kumarmani Mahakul (12/2/2015 12:36:00 AM)


    Very thought provoking sharing done definitely. Wisely amazing sharing done definitely.10 (Report) Reply

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Poem Submitted: Wednesday, December 2, 2015



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