देखना है अब कहाँ कहाँ फूल खिलते हैं Poem by M. Asim Nehal

देखना है अब कहाँ कहाँ फूल खिलते हैं

Rating: 5.0

इस शहर में सब जाने पहचाने से लगते हैं
हड्डियां और गोश्त वही हैं लेकिन ज़ेहन मुख़्तलिफ़ रखते हैं

एक सोच का फासला है इन ज़ेहन के दरमियान
वरना जब दिल मिलते हैं तो इत्तेफ़ाक़ रखते हैं

उजाले भी वहां के अंधेरों से कम नहीं
उर्यानीयत जहाँ ख्वाहिशों के पर रखते हैं

बेहद उदासियत भी खुशियों का सबब बनती है
जब बदल छट जाते हैं तब सितारे भी दिखते हैं

उड़ गयी हैं हवाएं खुशबू को लेकर
देखना है अब कहाँ कहाँ फूल खिलते हैं

ज़िन्दगी का काफिला चल पड़ा है सफर में फिर 'आशी'
देखना है उम्र के किस पड़ाव पे जिस्म और रूह जुदा होते हैं

COMMENTS OF THE POEM
Geetha Jayakumar 06 November 2018

Aapki kavita bahut hi kamaal ki hai. Har ek akshar ko chun chun kar likha hai aapney. ज़िन्दगी का काफिला चल पड़ा है सफर में फिर 'आशी' देखना है उम्र के किस पड़ाव पे जिस्म और रूह जुदा होते हैं Loved reading it. Thought provoking write. Thanks for sharing.

1 0 Reply
Kumarmani Mahakul 02 November 2018

उड़ गयी हैं हवाएं खुशबू को लेकर देखना है अब कहाँ कहाँ फूल खिलते हैं ज़िन्दगी का काफिला चल पड़ा है सफर में फिर 'आशी' देखना है उम्र के किस पड़ाव पे जिस्म और रूह जुदा होते है.......so touching and impressive. A beautiful poem so nicely executed.

1 0 Reply
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