ओस की बूँदें Poem by Brajendra Nath Mishra

ओस की बूँदें

ओस की बूँदें मोती - सी लगें,
दूबों पर टिकती हुयी सोती - सी लगें ।

उन्हें उँगलियों से छूना चाहूँ,
मुठियों में बंद करना चाहूँ ।

रात सितारे आते अम्बर से,
उन्हें धरा पर बिखरा जाते,
झोंके पवन के आते, सहलाते ,
पसारते, छितरा जाते ।

नहलाई हुयी उन बूंदों में,
छल - छल करती आती भोर,
पत्तों पर गिरती, चमकाती,
जीवन - रस से करती सराबोर।


फूलों पर बूंदे ठहरी हुयी,
छूती , चूमती, नाचती हैं,
टिकती, टप - टप गिरती हुयी,
पराग चुरा ले जाती हैं।


आओ उंगली के पोरों में,
कर लूँ कैद, ले भागूं,
उनके बदले थोड़ी - सी,
मोती गगन से मैं मांगू।

Monday, July 21, 2014
Topic(s) of this poem: hindi
POET'S NOTES ABOUT THE POEM
This is an English translation of my Hindi poem 'Os kee bunden'. I have tried to maintain the rhythm while writing this poem. This is dedicated to the children below 12 to make them aware of the nature's beauty. However there is a child in everyone's heart who wants to feel and touch the nature in its purest form.
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