कहीं आगे ना निकल जाऊँ Poem by Aftab Alam

कहीं आगे ना निकल जाऊँ

Rating: 5.0

वक़्त के दह्लीज पर मुददतें गूजार दी
वक़्त को अब भी डर है-
कहीं आगे ना निकल जाऊँ

परिंदो की ऊड़ान देख मैं भी ऊड़ने लगा,
अब परिंदो को डर है,
कहीं आगे ना निकल जाऊँ

सूरज तो मेरे क़िरदार का एक हिस्सा है,
हम दोनो जलते हैं, रोशनी के लिये,
सूरज को डर है कहीं सुरज ना हो जाऊँ

तू ने ना जाने कैसे छू दिया,
जिस्म टटोलता है, आंखे तलाशती हैं,
मुझे डर है, मैं कही तुम ना हो जाऊँ

जल में छेद करना मछलिओं से सीखा है,
मछलिओं को अब डर है-
मैं कही मछली ना हो जाऊँ

Saturday, February 14, 2015
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
Kavita Singh 08 September 2016

परिंदो की ऊड़ान देख मैं भी ऊड़ने लगा, अब परिंदो को डर है, कहीं आगे ना निकल जाऊँ.. kya khub likha hai awesome

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