सोच विचार (सितंबर 2024) पत्रिका में डॉ. वेद मित्र शुक्ल की सात कविताएँ Poem by Ved Mitra Shukla

सोच विचार (सितंबर 2024) पत्रिका में डॉ. वेद मित्र शुक्ल की सात कविताएँ

डॉ. वेद मित्र शुक्ल की सात कविताएँ
संपर्क: अंग्रेजी विभाग, राजधानी कॉलेज, राजा गार्डन, नई दिल्ली - 110015
मोबा.9599798727
1. तुलसी
कब और कैसे
आँगन के चौरे से तुलसी
बॉलकनी के गमले तक
आ गई?
सोच ही रहा था
किसी निष्कर्ष पर
अभी तक पहुँच भी नहीं पाया था कि
एक दूसरे महानगर में
बस चुके मेरे बेटे का
फोन आया
"पापा! बाज़ार से
तुलसी का अर्क ले आया हूँ।
आजकल रोज
पानी हो या चाय में
दो बूँदें डाल कर पीता हूँ।"
कुछ बोलूँ,
उससे पहले ही
भीतर कोई बोल गया
"आंगन, बॉलकनी, और अब बाज़ार"
फ़िलहाल, मुँह से बस इतना निकला,
"चलो, ठीक है! अभी भी
कैसे भी तुलसी साथ है।"

2. बीज स्मृतियों के
वह मौसम ही कुछ ऐसा था
कोई भी हो कैसा भी हो
माटी छू भर जाए बस
वह बीज बन जाता
माना धान तो रोपे गए थे
अनंत अनाज जो पाना था
मगर, महुआ, आम, फरेंद
एक भी बूंद रस
छोड़ा नहीं गया था
स्वाद लेकर गुठलियां
फेंक दी गई थीं
वे सब कब पेड़ बन गईं?
पता ही न चला
वो मौसम ही कुछ ऐसा था
स्मृतियां भी माटी से जुड़ गई थीं
कहीं भी कैसा भी रहूँ
लौट-लौट आता हूँ
शहर से गाँव
बीज स्मृतियों के
फल-फूल रहे हैं
उर्वर प्रदेश में।

3. आंगन जो घर में नहीं है
आंगन जो घर में नहीं है
मैं और तुम
मौका पाते ही
बॉलकनी की अलगनी पर
पसरे रहते हैं

तुलसी के चौरे-सी आस्थाएं
कंक्रीटमय फ्लैट में
सरस्वती नदी-सी विलीन हो
विस्मृति के अंधकार में खो रही हैं

मशीन के किसी कलपुर्जे-सा
अपार्टमेंट संस्कृति में धसा
आदम का चोला डाले हुए
ट्वेंटी फ़ौर बाई सेवेन खटना होता है

खेल-खिलौने, हँसी-ठिठोली
सब तो डिजिटल हो गए
किसी कोने में बैठा बचपन
वीडियोगेम खेल रहा होगा

न किस्सागोई है, न आशीषते हाथ
न गौरैया, न ही चाँद-तारे
पर्व औ त्योहार कहीं खो गए हैं
कैसे ढूँढ पाऊँगा इन्हें
आँगन जो घर में नहीं है
4. घर की कीमत
घर की कीमत
किसी प्रापर्टी डीलर से नहीं
जानिए
उस बच्चे से
जो घर का रास्ता
भूल गया है

कार में बैठे किसी पालतू कुत्ते से नहीं
जानिए
उस गौरैया से
जिसका आँगन बहुमंजिली इमारतें
लील गई हैं

सजे-धजे झाड़ फानूस या झालरों से नहीं
जानिए
मिट्टी के दीये वाले कुम्हार से
जिसके दीये उदास हैं
दूर होकर देहरियों से

सूनेपन में डूबीं बूढ़ी आँखों से
जानिए
जिनका नूर महानगरों की चकाचौंध में
गुम हो गया है
रौनकें तलाशते हुए

लम्बी उठी दीवारों या तने दरबानों से नहीं
जानिए
घर की कीमत असल में
भीतर बसे हुए
अनंत-असीम प्यार से

5. बाँसुरी की तलाश में
बाँसुरी की तलाश में बच्चों को
और भी बहुत कुछ मेले में दिखेगा
बहुत कुछ मिलेगा भी
कुछ भी पाकर
कुछ शान्त हो लेंगे
तो कुछ, बहुत कुछ पाकर,
लेकिन, कुछ
बाँसुरी की तलाश में
बाँसुरी पाकर ही
शान्त होंगे
अब, देखना है
आप और हम
किस श्रेणी में आते हैं।

6. बचपन की वह कहानी
"एक चिड़िया आई
और दाना लेकर उड़ गई
फिर, एक चिड़िया आई और…
फिर, एक चिड़िया और…"
अंतहीन दानों
और अंतहीन चिड़ियाँ वाली
बचपन की वह कहानी
हमेशा
एक कहानी ही नहीं रहती
समय बीतता है और
एक उम्र बाद
वह कहानी
सच साबित होने लगती है
कभी न खत्म होने वाले
दानों और चिड़ियाँ-सी
जीवन को उकता देने वाली सच्चाई
तब तक दिलो-दिमाग में
एकविध गूंजती रहती है
जब तक हम
पूरी तरह से
आँखें न मूँद लें।

7. गाँव का पेट
धान के बीज
बिखर जाएंगे पूरे गाँव में
रोपे जाएंगे
पसीने से गीली हुई
मिट्टी की देह पर
मन में, मस्तिष्क में
पोर-पोर पर
बादल आयेंगे-जाएंगे
फिर-फिर घिर आयेंगे
और गर मन भर नहीं भी घिरे
तो तन किसान के
बादल हो उठेंगे
सींचेंगे कुछ यों कि
कतरा-कतरा
बिरवा-बिरवा एक हो जाएंगे
अन्ततः गोदाम भर उठेंगे
शहर, कस्बे, महानगर सब
भर जाएंगे
लेकिन, अन्न उगाने वाले गाँव का पेट
केवल और केवल
खाली रह जायेगा
शेष कुछ बचता रहा है
‘हे राम! ' के देश में
तो बस, हे राम!

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