बेटी है इंक़िलाबी वो, जो ज़िद पे अड़ी है Poem by Anjum Alinagari

बेटी है इंक़िलाबी वो, जो ज़िद पे अड़ी है

बेटी है इंक़िलाबी वो, जो ज़िद पे अड़ी है।
चट्टान बन कर सामने गाड़ी के खड़ी है।

जिस हौसले से ज़ुल्म का देती जवाब है।
लगता है एहतिजाज हमें, इंक़िलाब है।

डर ख़ौफ़ मिटा कर के, घर छोड़ कर आई।
बस हक़ के लिए, लड़ रही है आज लड़ाई।

इंसाफ़ की उम्मीद है, दिल में जनून है।
बेटे से ज़्यादा गरम अब, बेटी का ख़ून है।

बदलेगी ये सियासत, इस मुल्क की भी हालत ।
बेटी की है ये चाहत, बस दूर हो जेहालत।
© अंजुम अलीनगरी, दरभंगा बिहार

Monday, July 27, 2026
Topic(s) of this poem: ghazal
POET'S NOTES ABOUT THE POEM
प्रोटेस्ट के दौरान मुम्बई में एक लड़की पुलिस के गाड़ी चट्टान की खड़ी हो गई, इस बात प्रभावित होकर ग़ज़ल लिखने का अवसर प्राप्त हुआ
COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Anjum Alinagari

Anjum Alinagari

Alinagar, Darbhanga
Close
Error Success