सड़क से जो संसद चले नौजवां। Poem by Anjum Alinagari

सड़क से जो संसद चले नौजवां।

सड़क से जो संसद चले नौजवां।
लगा जाग उठा है हिंदुस्तां।

हज़ारों की तादाद डट कर खड़ी थी।
सड़क हर तरफ़ की खचाखच भरी थी।

हुकूमत से जो चोट खाए हुए थे।
वही साथ देने को आए हुए थे।

भविष्य की लड़ाई , है बेहतर पढ़ाई।
हो नफ़रत की इस मुल्क से अब विदाई।

यही मांग लेकर, डटे थे, ‌ खड़े थे ।
यही सोच कर, नौजवां सब बढ़े थे।

बढ़े जैसे थोड़ा, तो टोका गया ।।
उन्हें आगे बढ़ने पे रोका गया।।।।।।

निहत्थों पे लाठी चलाई गई।
और आवाज़ ए हक़ को दबाई गई।

बहा ख़ून सर को जो फोड़ा गया।
भरी भीड़ पर गैस छोड़ा गया।

कोई रो रहा, कोई चिल्ला रहा था।
ज़ुल्म इतना ज़्यादा वहां हो रहा था।

जो हक़ है, जो सच है, जो मुद्दा अहम है।
हुकूमत की नज़रों में लगता वहम है।


वही नौजवां, देश के हैं विधाता।
ग़लत को ग़लत जो हमेशा बताता ।।

सुनें इनकी सरकार, वहम को न पाले।
है मस्ला बड़ा , जैसे हो हल निकाले।
© अंजुम अलीनगरी, दरभंगा बिहार

Friday, July 24, 2026
Topic(s) of this poem: nazm,urdu,studies,student,freedom
POET'S NOTES ABOUT THE POEM
ये नज़्म दिल्ली में चल रहे आंदोलन पर लिखी गई है। 20 जुलाई 2026 को जो छात्रों के साथ हुआ, उसकी हक़ीक़त को रेखांकित करती है
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Anjum Alinagari

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Alinagar, Darbhanga
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