सोच समझ कर क़दम बढ़ाएं Poem by Anjum Alinagari

सोच समझ कर क़दम बढ़ाएं

सोच समझ कर क़दम बढ़ाएं।
धीरे धीरे क़दम उठाएं।

मक़सद मंज़िल तक जाना है।
काम ग़रीबों के आना है।

उम्मत बन कर जीना सीखें।
ज़ख़्म को सबके सीना सीखें।

जिनका ओहदा बहुत बड़ा है।
उन के पिछे बहुत पड़ा है।

मौक़ा न दें दुश्मन को।
साफ़ रखें, तन मन धन को ।

सब्र से काम को दें अंजाम ।
ताकि ख़ुश हो, ख़ासो आम ।
© अंजुम अलीनगरी, दरभंगा बिहार

Tuesday, September 22, 2026
Topic(s) of this poem: ghazal
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ग़ज़ल की शक्ल में मशविरा है
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Anjum Alinagari

Anjum Alinagari

Alinagar, Darbhanga
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