शुक्र ए ख़ुदा के हम सब खाने गए कबाब Poem by Anjum Alinagari

शुक्र ए ख़ुदा के हम सब खाने गए कबाब

शुक्र ए ख़ुदा के हम सब खाने गए कबाब।
था ज़ाइक़ा कबाब का, सचमुच में लाजवाब।

ये शीन सर की कोशिश काविश का था, समर।
एक यादगार बन गया, हम सबका ये सफ़र।

ठंडा, कबाब, पूरी , था मिर्च और मसाला ।।
बैठे चिटाई पर थे, अंदाज़ था निराला।।।।

आता गया दना दन, खाते गए खटा खट।
अफ़सोस आख़री में, ये गोश्त ही गया घट।।।

जब सबने हाथ रोका, निकाली गई मिठाई ।
पार्टी के बाद हम सब, पीने गए थे चाई ।


ये यादगार लम्हा, ये बावक़ार महफ़िल।
सेन्सस में साथ थे जो, वो सब हुए थे शामिल।

जो साथ साथ थे सब इज़्ज़त'मआब थे,
अंजुम की अंजुमन में, सभी आफ़ताब थे।
© अंजुम अलीनगरी, दरभंगा बिहार

Wednesday, August 5, 2026
Topic(s) of this poem: food,friends,teacher
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कबाब की पार्टी पर लिखी गई कविता
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Anjum Alinagari

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Alinagar, Darbhanga
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