खोज रहा हूं अन्ना को। Poem by Anjum Alinagari

खोज रहा हूं अन्ना को।

पलट पलट कर पन्ना को।
खोज रहा हूं अन्ना को।

कहां गए आंदोलनकारी।
कहां गए वो शुद्ध व्यापारी।

जिनकी वजह से जनता हारी।
फ़ैली नफ़रत की बीमारी।

नज़र को ‌ जब दौड़ाते हैं।
नज़र नहीं वो आते हैं।

भले वो काला धन न आया।
पर बाबा ने ख़ूब कमाया।

लोगों के विश्वास को तोड़ा।
लोगों को मझधार में छोड़ा ।

आंदोलन की जड़ थे अन्ना।
धर से लेकर सर थे अन्ना।

नाम था अन्ना का आंदोलन ।
जिस से कांप उठे मनमोहन।

जिनका मक़सद, बहुत बड़ा था।
जो जनता के साथ खड़ा था।।

शिक्षित थे, शिक्षा के प्रेमी ।
बहुत सी भाषा के थे ज्ञानी ।।

ख़ामोशी से, काम किया।।
घर घर शिक्षा, आम किया।
चोर उचक्कों ने मिलकर,
उनको बस बदनाम किया।

मंहगाई जब सता रही है।
तब वो मुझ से बता रही है।
दौर वही था सबसे बेहतर।
दौर अभी है, बद से बदतर ।

ढूंढ रहा है, आज बिहारी।
कहां गए आंदोलनकारी।
© अंजुम अलीनगरी दरभंगा बिहार

Sunday, July 12, 2026
Topic(s) of this poem: education,youth,indian,reveloution
POET'S NOTES ABOUT THE POEM
मनमोहन को ग़लत बताने वाले आज के हालात पर खामोश क्यों हैं
COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Anjum Alinagari

Anjum Alinagari

Alinagar, Darbhanga
Close
Error Success