हों अगर ज़िंदा दिल, ज़िंदा ज़मीर।
तोड़ देते हैं ज़ुल्म की ज़ंजीर ।
फ़िक्र में रात दिन वो रहते हैं,
जो समझते हैं, ज़िक्र की तासीर।।
हक़ के ख़ातिर खड़े हुए जब लोग
बदली बदली है, मुल्क की तस्वीर।।
जिसको लफ़्ज़ों में जीत कहते हैं
वो असल में है ख़्वाब की ताबीर।
आज उनका है, कल तुम्हारा है,
ये बताती है , आप की तदबीर।
© अंजुम अलीनगरी, दरभंगा बिहार
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem