जंतर-मंतर की आवाज़।
आदत से आ जाएं बाज़।
नहीं बदले , तो बदलेंगे
नेताओं का हम अंदाज़।।।
हम भारत के लोगों का ।
है देश हमारा फूलों सा ।
जिस फूल में हम सब शामिल हैं।
उस फूल से नेता ग़ाफ़िल हैं।
है ग़ाफ़िल नेता , ग़फ़लत में।
जिस पे है केस अदालत में।
वो नेता क्या, कर पाएगा।।।
वो कैसे राह दिखाएगा।।।।।
जो भटक चुका है रस्ते से।
उसे क्या मतलब है बस्ते से ।
वो क्या जाने, क्या शिक्षा है।
बस राज करें, ये इच्छा है।।।
क्या मुद्दा है, क्या मक़सद है।
बस कुर्सी पाकर गद गद है।।
वो दिन आया है रोएगा।
वो रात में भी न सोएगा।।।।
दरअसल , हमारे पहरेदार।।।
बिल्कुल ही नहीं हैं ख़ुद मुख़्तार।
जो हुकुम हुआ वो करते हैं।
बच्चों से ही अपने लड़ते हैं।
है पता उन्हें क्या नेता है।
जो सुख न सुविधा देता है।।
जो पेपर लीक कराता है।
वो लड़ता नहीं, लड़ाता है।
नफ़रत की सियासत करता है
उल्फ़त से बहुत जो डरता है।
वो नेता, मुल्क का है ग़द्दार ।।
वो बड़ी सज़ा का है हक़दार ।।
© अंजुम अलीनगरी, दरभंगा बिहार
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