प्यारे बच्चों,
घर का खाओ, घर में खाओ।
बिला वजह न बाहर जाओ।
बाहर का जो खाते हैं।
वो बिमार पर जाते हैं।
इसलिए,
घर का खाओ, घर में खाओ।
बिला वजह न बाहर जाओ।।।।
प्यारे बच्चों,
न खा चर्बी, न पी ठंडा।
खा तू सब्ज़ी, खा तू अंडा।
दुध दही खोआ खाया कर।
शाम में खेलने को जाया कर ।।।
शाम ढले तो घर आया कर ।
खाने में न शर्माया कर ।।।
इससे सेहत रहेगी अच्छी।
उम्र तुम्हारी अभी है कच्ची ।
अपने बड़ों की बात मानों।
अपने आप को तुम पहचानों।
क्यों आख़िर तू डरा डरा है ।
जब जज़्बा और जनूं भरा है।।।
ठानो पहले क्या करना है।
मेहनत से तुमको पढ़ना है।
राह में मुश्किल आएगी पर
मुश्किल से तुमको लड़ना है।।
अहद करो तुम अहद करो ।
बच्चों, दिल से अहद करो।।।।
© अंजुम अलीनगरी दरभंगा बिहार
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem