सोंच के देखें, कितने बेबस, हैं मज़दूर किसान। Poem by Anjum Alinagari

सोंच के देखें, कितने बेबस, हैं मज़दूर किसान।

सोंच के देखें, कितने बेबस, हैं मज़दूर किसान।
जिनके बच्चे, मुश्किल से कुछ, ले पाते हैं ज्ञान।

जिनकी मेहनत का सारा फल खा जाता है मालिक,
उन के दम से चमक रहा‌ है, अपना हिंदुस्तान।

ये न रुकते, ये न थकते , बस करते हैं काम,
धूप कड़ी हो, या हो बारिश, या आंधी तुफ़ान।

जो फूंस के घर में रहते हैं, कुछ भी न किसी से कहते हैं
वो बना रहे हैं, अपने देश में, पूल, सड़क मकान ।।

जो दिन भर खड़े हैं रहते, जो दिन भर डटे हैं रहते,
वही सचमुच में कहलाते हैं, मानवता की जान ।

इनको कस कर डांटने वालों, याद रखें ये बात,
आप के जैसे, मेरे जैसे, ये भी हैं इंसान।।।

जिनकी वजह से जिस्म व जां को मिलता है आराम
मुल्क के ऊपर, और हम सब पर इनका है एहसान।
© अंजुम अलीनगरी, दरभंगा बिहार

Monday, July 27, 2026
Topic(s) of this poem: ghazal
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मज़दूर और किसान की हालत का बताती है
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Anjum Alinagari

Anjum Alinagari

Alinagar, Darbhanga
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