मान जाओ, मान जाओ, हे सरदार Poem by Anjum Alinagari

मान जाओ, मान जाओ, हे सरदार

मान जाओ, मान जाओ, हे सरदार।
मांग रहा है, हक़, हक़दार।

इन बच्चों पर, ज़ुल्म न ढाओ।
करो जो वादा उसे निभाओ।

झूठ की खेती, मन की बात।
बदल नहीं सकते , हालात।

बस अब, इतना काम करें।
उम्र हुई आराम करें ।

यूथ को मोक़ा देकर जाएं।
द्वेष और घृणा लेकर जाएं।

जनता सच में जाग चुकी है।।।
जीवन को त्याग चुकी है।

डरना सबने छोड़ दिया है।
दिल को दिल ‌ से जोड़ दिया है।

हर सू नारा गूंज रहा है।
सबका सब ये पूछ रहा है।

अच्छा दिन कब लाओगे तुम।।।
कब तक ‌ ये बतलाओगे तुम।।।

पूछ रहे हैं ज़िम्मेदार।
तरस रहे हैं क्यों हक़दार।
© अंजुम अलीनगरी, दरभंगा बिहार

Monday, July 27, 2026
Topic(s) of this poem: ghazal
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Anjum Alinagari

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Alinagar, Darbhanga
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