'कलाम 'सा कलाम कर ।
मुहब्बों को आम कर ।
जो इल्म से मिलें ग़नी
तो, उनका एहतराम कर ।
चमक उठेगी ज़िंदगी
जो कह गए, वो काम कर ।
वो दे गए सबक़ हमें,
तू सादगी में, नाम कर ।
'कलाम'की किताब का
तू पहले इंतज़ाम कर।
बेकार की ही बात में
न यूं ही सुबह-शाम कर ।
© अंजुम अलीनगरी, दरभंगा बिहार
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