मौत तो एक बहाना फक़त है,
मौत का कुछ ठिकाना नहीं है।
कौन कहता है पुछो ज़रा सा,
मुझ को दुनिया से जाना नहीं है।
रूहे मंसुर कहती है सब से।
मेरा मिलना हुआ मेरे रब से।
दीनों दुनिया की दौलत मिली है।
बाग़े जन्नत में कलीयाॅ खीली है।
मुश्क व अम्बर से दिल शादमाॅ है।
दुनिया वालों से बेहतर मकाॅ है।
साथ मेरे नबी की है सुन्नत।
साथ मेरे क़ुरआं की तिलावत।।।
मेरा ईमान है मेरी ताक़त।।
काम आती है हर एक एबादत।
राहे हक़ चला हूॅ हमेशा ।
दीने इस्लाम था दिल का पेशा।।।।
ख़्वाब ख़ूबी बयाॅ कर रही थी।
मुहॅ में छीप के ज़बाॅ डर रही थी।
अश्क आंखों से यूॅ बह रहा था।
ग़म अकेला ये दिल सह रहा था।
हक़ के दाई बने और रहबर ।
ईल्म के थे यक़ीनन समंदर ।
प्यारो उल्फ़त के वो पासबां थे ।।।
इस जहाॅ में वो एक गुलसीतां थे।
थे मोहब्बत के बानी , वो नाना ।
जिनकी ख़ुबी है मुशकिल बताना ।
मौत तो एक बहाना फक़त है।
मौत का कुछ ठिकाना नहीं है।
रचना&लेख: - अंजुम अलीनगरी
Darbhanga, Bihar
25/01/17
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