क़लम को थाम लो कसकर,
क़लम का ये ज़माना है।
किसी से कम नहीं हैं हम,
क़लम से ही बताना है।
क़लम वाले जहां में
सुरख़ुरु आबाद रहते हैं,
हमेशा नफ़रतों की क़ैद से
आज़ाद रहते हैं।
क़लम हर एक क़दम को
आपके मज़बूत करता है।
क़लम मज़बूत हो तो
दुश्मनों से कौन डरता है।
मुझे ये बात घर-घर जा के
बच्चों को बताना है, , , , ,
क़लम को थाम लो कसकर,
क़लम का ये ज़माना है।
क़लम से दोस्ती करना
अक़लमंदों ने सीखा है।
क़लम न हो तो लगता
ज़िंदगी का रंग फीका है।
क़लम वालों, की
उल्फ़त से भरी सारी कहानी है।
क़लम से प्यार करना
इल्म वालों की निशानी है।
क़लम से इल्म वालों का
बहुत रिश्ता पुराना है।।
क़लम को थाम लो कसकर,
कलम का ये ज़माना है।
उड़ो शाहीन बनकर तुम
हमेशा अपने ख़्वाबों में।
क़लम की अहमियत जानो,
मुहब्बत की किताबों में।
क़लम को दोस्त, रहबर,
हमनवा अपना बनाओगे,
मेरे भाई, यक़ीनन
एक दिन मंज़िल को पाओगे।
हमें इस दौर में गर आंख,
दुश्मन से मिलाना है।।।
क़लम को थाम लो कसकर,
कलम का ये ज़माना है।
© अंजुम अलीनगरी, दरभंगा, बिहार
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