दावत ए तहज़ीब ए हिंद Poem by Anjum Alinagari

दावत ए तहज़ीब ए हिंद

कम से कम ये काम हम न करें।
दावत ए तहज़ीब को ख़त्म न करें।

ख़बर खै़रियत सबकी लेने का
ये ठिकाना है दावत देने का ।

अगली पार्टी का इंतज़ार है बस।
याद आता है बहुत आम का रस ।

क्या मज़ेदार था, वो लॉलीपॉप
सबसे बेहतर यही था, सबसे टॉप।

काफ़ी तीखी थी, गर्म बिरयानी।
और बोतल में था भरा पानी।।।

मज़ा लेकर के खाया फ़ालूदा
चाय अच्छी थी, गर्म कुछ ज़्यादा।

क्या मज़ेदार था वो हौज़ी खेल ।
जिसमें नम्बर था आता सब बेमेल।

सबके सबको मिला इनाम में जग।
रात अंधेरी, छत पे था जगमग।

बात कैसे न हो मोमेंटो की ।
थी मुलाक़ात चंद घंटों की ।

बारिश होने लगी गए सब घर ।
शुक्रिया आप का शाहीद सर।

©अंजुम अलीनगरी

Tuesday, June 30, 2026
Topic(s) of this poem: nazm
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भारतीय जनगणना 2027 के मकानसूचीकरण के काम के सकुशल ख़त्म होने पर दी गई दावत पर आधारित नज़्म
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Anjum Alinagari

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Alinagar, Darbhanga
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