अये पुतिन, अये बशर Poem by Anjum Alinagari

अये पुतिन, अये बशर

अये पुतिन । अये बश़र ।
सारा तड़पे शहर ।

मेरे सपने भी हैं , मेरे अपने भी हैं।
मुझ को ऐसे न हरग़िज़ सता।।।

क्या हुई है ख़ता, बस ये इतना बता।
मुझ को ऐसे न हरग़िज सता।।।।

रो रही है ज़मीं, आसमा चार सू।
मिट रहा है जहाॅ, लुट रही आबरू।।

आज ख़तरे में जाॅ , और जहाॅ है मेरी।
ज़ुल्म तेरा है , ज़ालिम हूकुमत तेरी।।

तुझको बर्बाद कर देगी अज़मत मेरी।
दिन वाला हूॅ मैं , सब्र वाला हूॅ मैं।।

रब यक़िनन करेगा अता।।।

अय पुतिन , अये बश़र ।
मुझ को ऐसे न हरग़िज़ सता।।।

ख़ू का दरया बहाया है तुने।
ज़ूल्म क्या है बताया है तुने।

बाप बेटे , बहन माॅ को मारा।।
घर का घर और शहर को ऊजाड़ा।

मेरी इंसानियत का जनाज़ा।
सारे आलम को तुने नवाज़ा।।

ज़ाॅ तेरी भी ये लेगा मेरा रब।।
दे दे अपनी क़बर का पता।।।।

अय पुतिन । अय बश़र।।।।।।।

रचना: - अंजुम अलीनगरी, दरभंगा, बिहार

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Anjum Alinagari

Anjum Alinagari

Alinagar, Darbhanga
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