मकान जब से जला रहा है। दूकान अपनी चला रहा है। Poem by Anjum Alinagari

मकान जब से जला रहा है। दूकान अपनी चला रहा है।

मकान जब से जला रहा है।
दूकान अपनी चला रहा है।

लड़ा लड़ा कर के हम सभी को
वतन को मेरे रुला रहा है।

है जिसके ऊपर हज़ारों तोहमत
वो आंख कैसे मिला रहा है।

है ख़ून पीने की जिसको आदत
वो सबको, पानी पिला रहा है।

वो डर के मारे नहीं है जाता
जिसे मणिपुर बुला रहा है।

ये दुम दबाकर न भाग जाए,
वो दिन पलट कर के आ रहा है।
© अंजुम अलीनगरी, दरभंगा बिहार

Wednesday, August 12, 2026
Topic(s) of this poem: hindi,people
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नफ़रत आम होती जा रही है
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Anjum Alinagari

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Alinagar, Darbhanga
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