ज़ालिम की हिमायत है, चुपचाप ज़ुल्म सहना Poem by Anjum Alinagari

ज़ालिम की हिमायत है, चुपचाप ज़ुल्म सहना

कुछ भी नहीं कहना।
बस देखते रहना।
ज़ालिम की हिमायत है
चुपचाप ज़ुल्म सहना ।

तादाद पे मत जाओ।
न वक्त से घबराओ।
हालात से लड़ने का
मिल जुलकर क़सम खाओ।

ईमान की ताक़त है।
और सब्रो क़नाअत है।
इस क़ौम के ग़ाज़ी में
भरपूर शुजाअत है।।।

ये बात हक़ीक़त है।
हर ज़ुल्म मुसीबत है।
हर ज़ुल्म को दफ़ना दो
ये कहती शरीअत है।

इस्लाम के शैदाई।।
सहते नहीं रुसवाई।
नफ़रत को मिटाना है
आ हाथ मिला भाई ।
© अंजुम अलीनगरी

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Anjum Alinagari

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Alinagar, Darbhanga
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