कल तलक ज़ेर था, अब ज़बर हो गया।
रास्ता इसलिए पुर-ख़तर हो गया।
अच्छे अख़्लाक़, किरदार, गुफ़तार से,
दूर गांवों का गांवों , शहर हो गया।
प्यार, उल्फ़त मुहब्बत का क्या हो असर,
नफ़रतों से ज़ेहन जब, ज़हर हो गया।
जिसके लहज़े में तल्ख़ी, अना, रोब हो,
वो समझता है, अब बालो पर हो गया।
जिसको मंज़िल मिली न कभी राह में,
उसका मानों ख़त्म, हमसफ़र हो गया।
© अंजुम अलीनगरी, दरभंगा बिहार
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