जानते, सब कुछ हैं,
सारे, ज़माने, वाले।
तेरी औक़ात है क्या,
आने और जाने वाले।
जश्न ऐसा है, के आज़ाद हुए, ,
क़ैद में, रहने वाले।
शायद अंधे हैं, हमें , , , ,
ग़ैर, समझने वाले।
माफ़ करना मुझे,
तल्ख़, हक़ीक़त है ये ।
हैं, सियासत में, बहुत,
ख़ून बहाने वाले।
कल भी अपना था,
आज भी अपना है वो।
सुन लो, ऐ
नाचने, गाने वाले।
ज़िंदगी मुश्किल में है,
पर, आज़ाद हैं हम।।।
ऐसा कहते हैं यहां,
ग़म को छुपाने वाले।
होंगे, बैठे, , कहीं,
ख़ामोश अभी, , , , , ,
इस अंधेरे में,
चिराग़ो को, जलाने वाले।
सुनो, ये जो आहट है,
बौखलाहट है, , ,
कह रहे हैं, आइना,
नफ़रत को, दिखाने वाले।
©अंजुम अलीनगरी, दरभंगा बिहार
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