आज नहीं तो कल बनेगा।
काट के जंगल महल बनेगा।
पेड़ बिना प्रदूषण होगा।
ख़तरे में फिर जीवन होगा।
सांस नहीं ले पाएंगे हम।
बे मौत मर जाएंगे हम ।
कहीं नहीं हरियाली होगी।
नाम की बस, ख़ुशहाली होगी।
बाढ़, तपिश से जां जाएगी।।
रोते बिलखते मां आएगी।
कहेगी बोलो, तुम बतलाओ।।
मुझ को थोड़ा सा समझाओ।
जिस धरती पर चलो फिरोगे।
उस धरती पर ज़ुल्म करोगे।
मां के नाम लगाओ पेड़।
ताकि खूब दहाड़े शेर ।।
शेर को वन में वास मिले ।
जीने का कुछ आस मिले ।
हर इंसान की ख़्वाहिश है,
साफ़ हवा में सांस मिले ।।।।
पेड़ न काटें, खुशियां बांटें।।
पेड़ जो काटें, उनको डांटें।।।
आज है इससे, कल है इससे।
मिलता है आक्सीजन जिससे।
© अंजुम अलीनगरी दरभंगा बिहार
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem