नया साल Poem by Anjum Alinagari

नया साल

साल आता है, , साल जाता है।
पर मगर ये, , सबक़ सिखाता है।
ठान लेता है , , दिल के अंदर जो,
कुछ न कुछ, , , कर के वो दिखाता है।
फिर वो मंज़िल को, , , अपने पाता है।
ख़्वाब ए ग़फ़लत से, , जाग जाता है।



जोश व जज़्बा ये, , , , साथ लाए है।
रोते हँसते ये, , , , बीत जाए है।
रोज़ व शब हर, घड़ी से नाता है।
वक़्त की अहमियत, , , ; बताता है।
साल आता है, , , , , , साल जाता है।

साल ए नौ तुझ से, , , कह रहा हूं मैं।
ज़ुल्म बरसों से, , , सह रहा हूं मैं।
दीन व दुनियां हमें भी, , हासिल हो।
इस ज़मीं ‌ पर कहीं न क़ातिल हो।
ज़िन्दगी प्यार की, , , , ज़रूरत हो।
ख़ूबसूरत हो, , , , , खूब सीरत हो।
दिल ये हसरत में, डूब जाता है।
साल आता है, , , , साल जाता है।

रचना &लेख: - अंजुम अलीनगरी
दरभंगा, बिहार

POET'S NOTES ABOUT THE POEM
ये नज़्म नए साल के बारे में लिखी गई है।
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Anjum Alinagari

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Alinagar, Darbhanga
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