'आदमी की औकात' कवि गया प्रसाद की कविता Poem by Gaya Prasad Anand 'Anand Gondavi'

'आदमी की औकात' कवि गया प्रसाद की कविता

किसी ने नाम पूछा है,
किसी ने जाति पूछी है।
मेरे जज़्बात पूछे हैं,
मेरी औक़ात पूछी है।
बता दूँ आज मैं उनको,
अपने बारे में सब कुछ।
जिनके शब्द तीखे हैं,
जिनकी सोच ओछी है ॥
मैं मिट्टी का खिलौना हूँ
बड़ा ही ख़ूब सूरत हूँ
बनें हो जिस मिट्टी से तुम
उसी की मैं भी मूरत हूँ
लोग हैं पूजते मुझको
अभी सबकी जरूरत हूँ
बड़ा ही शान है मुझमें
बड़ा अभिमान है मुझमें
करूँ इंसान की सेवा
यही बस जात है मेरी
मिलूंगा मिट्टी में एक दिन
यही औकात है मेरी
घमंड किस बात की तुझको
बता क्या जात है तेरी
तूं भी माटी का पुतला है
बता औकात क्या तेरी
मिलेगा तूं भी मिट्टी में
तूं भी शमशान जाएगा
अपना क्या पराया क्या
अकेला खुद को पाएगा
मैं भी मानव, तूं भी मानव
तो फिर ये भेद कैसा है
कभी इंसान बनकर देख
तूं भी तो सबके जैसा है
जिस दिन घमंड का चश्मा
तूं आंखों से हटायेगा
उस दिन दुनियाँ की नजरों में
तूं भी पूजा जाएगा

मौलिक रचना
गया प्रसाद आनन्द
9919060170

'आदमी की औकात' कवि गया प्रसाद की कविता
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