हमें गंवार मत समझो साहब,
हमने सारा जहान देखा है।
अपने छोटे से गाँव में ही,
पूरा हिंदुस्तान देखा है॥
भूख देखी, लाचारी देखी,
बच्चों की बेकारी देखी।
फिर भी हँसता गाँव मिला तो,
जीने की तैयारी देखी॥
गरीब देखे, अमीर देखे,
मरे हुए कुछ ज़मीर देखे।
सिसकती आहें देखी,
सूनी-सूनी राहें देखीं॥
रिश्ते-नातेदारी देखी,
अपनों की दिलदारी देखी।
छोटे से ही गाँव में अपने,
जमकर खातेदारी देखी॥
हमें गंवार मत समझो साहब,
हमने सारा जहान देखा है।
अपने छोटे से गाँव में ही,
पूरा हिंदुस्तान देखा है॥
ऊँचे-ऊँचे महल देखे,
छप्पर वाले घर देखे।
नौकरशाहों की शान देखी,
बेबस मज़दूर-किसान देखे॥
तन पर पसीना देखा,
माटी का सम्मान देखा।
अन्न उगाते हाथों में ही,
धरती का भगवान देखा॥
नदी देखी, झरना देखा,
कुआँ देखा, तालाब देखा।
चट्टान-सी सूखी आँखों में,
आँसुओं का सैलाब देखा॥
हमें गंवार मत समझो साहब,
हमने सारा जहान देखा है।
अपने छोटे से गाँव में ही,
पूरा हिंदुस्तान देखा है॥
मंदिर देखा, मस्जिद देखी,
हर दिल में उम्मीद देखी।
मज़हब से ऊपर उठकर हमने,
इंसानियत की जीत देखी॥
हम अनपढ़ हो सकते हैं लेकिन,
दुनिया का व्यवहार जानते हैं।
माटी में रहकर भी साहब,
जीवन का सार जानते हैं॥
काग़ज़ वाले ज्ञान से बढ़कर,
हमने अनुभव का ज्ञान लिया है।
इस छोटे से गाँव की मिट्टी ने,
हमको सच्चा इंसान किया है॥
हमें गंवार मत समझो साहब,
हमने सारा जहान देखा है।
अपने छोटे से गाँव में ही,
पूरा हिंदुस्तान देखा है॥
त्याग देखा है, समर्पण देखा है,
अपनत्व देखा, प्यार देखा है।
एक साथ मिल-जुलकर रहते,
संयुक्त परिवार देखा है॥
गाँव में एकता, भाईचारा है,
हमारा गाँव हमें सबसे प्यारा है।
करुणा देखी है, मानवता देखी,
हर दिल में सच्चा इंसान देखा है॥
हमें गंवार मत समझो साहब,
हमने सारा जहान देखा है।
अपने छोटे से गाँव में ही,
पूरा हिंदुस्तान देखा है॥
— गया प्रसाद आनन्द ‘आनन्द गोण्डवी'
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