जाति धर्म कै नशा Poem by Gaya Prasad Anand 'Anand Gondavi'

जाति धर्म कै नशा

काव कही भाय
जाति धर्म कै नशा
अब खोपड़िप चढ़ कै बोलत है
आदमी दूसरे का कम
अपने का ज़्यादा तौलत है
लागत है धर्म कै काँटा
अब पसंघा होइ गवा
आदमी क्रूर, नीच
लुच्चा लफंगा होइ गवा

मौलिक रचना
गया प्रसाद आनन्द
मो.9919060170

जाति धर्म कै नशा
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